Tuesday, June 13, 2017

भगवान बद्रीविशाल की अनुपम कृपा --


भगवान बद्रीविशाल की अनुपम कृपा
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-एक सज्जन रक्षा विभाग में कार्यरत थे, उनको धार्मिक यात्रा करने का बहुत शौक था | उन्होंने पुरी,रामेश्वरम और द्धारकाधाम की यात्रा कर चुके थे, केवल बद्रीनाथ धाम ही बचा था, सो वह अपने सेवाकाल में एल० टी ० सी पर बद्रीनाथधाम की यात्रा जाने चाहते थे और वहाँ पर जाने का निश्चय किया | 
                वे बॉम्बे से वह हरिद्धार आये  और 2009 की कार्तिक पूर्णिमा पर हर की पौड़ी में स्नान किया और दीपदान करने के वहाँ से बद्रीनाथ धाम की यात्रा आरम्भ की , रात्रि में जोशीमठ पहुँचे और रात्रि में वहाँ विश्राम किया | आधे घंटे वहाँ  पहुँच गये, गाड़ी ड्राइवर उन्हें उतार कर गाडी़ ठीक करवाने चला गया ।वह बीमार थे और १०० मीटर चलना भी मुश्किल हो गया।बलड प्रेशर का मरीज थे वहाँ पर उनकी साँस लेने की तकलीफ हो गई। बड़ी कठिनाई से मंदिर पहुँचे ।
           दर्शन से पहले तपतकुणड मे स्नान करने की परम्परा है।उसके पास नर-नारायण पर्वत जमी बर्फ के साथ  तपतकुणड के गरम पानी का सामंजस्य सिर्फ प्रभु की लीला लगती थीं। स्नान के पश्चात वह महिला प्रसाद लेने साथ वाली दुकान पर गई।तो दुकानदार ने कहा पट बंद होने वाले हैं आप जाओ मै प्रसाद बाबू जी को दे दूंगा। बाद उस महिला के पति प्रसाद लेकर आ ये और दोनों ने जी भर कर बदरीविशाल के दर्शन किए।खिचड़ी का भोग प्रसाद मे खाया और भगवान को धन्यवाद दिया।
            वापस की यात्रा करण प्रयाग मे रात्रि का विश्राम किया।दूसरे दिन पुनः यात्रा आरंभ की श्रीनगर की धारी देवी के दर्शन करते हुए शाम को हरिद्वार लौट आ ये।रात को 9 बजे मथुरा और ब्रज भूमि के दर्शन के लिए चल दिये। सारे दिन के थके थे, सो शीघ्र नींद आ गयी। अचानक उस महिला की नींद घबडा़हटके  कारण खुल गयी और महिला ने पति को झकझोर कर उठाया ।उनको घबडा़ गये कि एक्सी डेनट तो नहीं हो गया है। परंतु सब कुछ ठीक था, तब उन साहेब ने पूछा कि क्या हुआ है तब उस महिला ने बताया कि मैंने एक पीतवस्त्रधारी सामने देखा था,जो पूछ रहे थे कि दर्शन हो गये अच्छे से। मैंने उन्हें जबाब दिया कि हाँ पर आप कहाँ चले गये थे? मैं आपको को कुछ भेंट भी नहीं दे सकी। वो बोले कि तुम्हें दर्शन हो गये, मुझे तुमसे सब कुछ मिल गया।जब चेतनावसथामे आयी तो सामने कोई नहीं था । तभी मुझे मंदिर की सीढ़ियों पर घटित घटना याद आ गई और उसे आपको बताने के लिये उठा दिया।
    उसके बाद मुझे याद आया कि दुकानदार द्वारा पट बंद होने वाले हैं और  वह महिला तेजी से मंदिर की चली वहाँ पर सीढ़ियों देख कर उसका दिल बैठ गया कि किसी प्रकार चढ़ पाऊँगी? दो चार सीढ़ियों चढ़ने के बाद मा वहाँ पर बैठ गई तथा उसका साँस फूलने लगा विचार करने लगी दर्शन कैसे हो गे ? वहाँ पर इन्हीं पीतवस्त्रधारी को अपने सामने खड़े देखा, उन्होंने ने हाथ बढ़ कर पूछ रहे थे क्या दर्शन करना हैं। उसने कहाँ हाँ तो वह हाथ बढ़ा कर ऊपर बढ़ने ले गे।उसे पता नहीं लगा कि किस प्रकार गर्भ गृह मे पहुँची और पट बंद हो रहे थे और वह महिला प्रभु के सामने खड़ी थीं। उसके बाद वह महिला भूल गई थी। वह सोच रही थी क्या स्वयं आकर उसे दर्शन दिए।यह उस महिला का श्रद्धा और विश्वास तथा आस्था थी ,जो इसे प्रकार की घटना घटी थी।

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