ज्योतिष शास्त्र मे नाड़ी का अर्थ समय का एक मात्रा नाम है।जो की आधे
मुहूर्त के बराबर होती हैं।जिस प्रकार होरा (काल) अर्थात् दिन-रात का सूचक
माना जाता हैं।नाड़ी शब्द भी समय वाचक हैं।नाड़ी शास्त्र दक्षिण भारत मे अधिक
प्रचलित हैं।नाड़ी ग्रन्थ मनुष्य के जीवन की समस्त जीवन की घटनाओं का वर्णन
करनेवाला ग्रन्थ हैं।
नाड़ी शास्त्र की विशेषता :-
उत्तरी भारत मे भृगु संहिता, अरूण संहिता, रावण संहिता आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। इन ग्रन्थों मे भविष्य और भूतकाल मे उत्पन्न होने वाली मनुष्य की सभी बातों का ज्ञान वृत्तान्त का विस्तृत लिखा है।
नाड़ी शास्त्र की विशेषता :-
उत्तरी भारत मे भृगु संहिता, अरूण संहिता, रावण संहिता आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। इन ग्रन्थों मे भविष्य और भूतकाल मे उत्पन्न होने वाली मनुष्य की सभी बातों का ज्ञान वृत्तान्त का विस्तृत लिखा है।
दक्षिण भारत मे नाड़ी शास्त्र मे नन्दी नाड़ी, शुक्र नाड़ी, भुजंदर नाड़ी, सप्तऋषि नाड़ी आदि ग्रन्थ हैं जिसमें मनुष्य जीवन का भूत औऱ भविष्य काल का विस्तृत ज्ञान मिलता हैं।
चन्द्र नाड़ी :- इस नाड़ी को जन्म नाड़ी के रुप मे भी जाना जाता हैं।इसमे मनुष्य के सभी रिश्ते जैसे कि मां, पिता, भाई-बहन, मामा,सुसराल पक्ष के विषय मे जानकारी मिलती हैं।इसके साथ अंशों का पूरण ज्ञान मिलताहै।इन नाड़ी अंशों की संख्या 150 हैं।इन की गिनती इस प्रकार की जाती हैं:-
यदि चर राशि का लगन हो तो इसकी गणना 1.वसुधा,2.वैष्णवी, 3.ब़ाह्मी,4 कालकूटादि,5.शांकरी, 6.सुधाकरी,7.समा,8.सौम्या, 9.सुरा,10.माया, 11.मनोहरा,12.माधवी,13.धारा, 14.मालिनी, 15.मञ्जुसवना16.कुभिमनी,17.कुटिला,18.जगती,19.प्रभा,20.परा,21.पयस्विनी,22.जर्जरा,23.ध्रुवा,24. .मुसला,25.मुद्गगरा26.पाशा, 27.चमपका,28.दामा,29.मही,30.कलुषा,31.कमला,32.कान्ता, 33.कालिका,34.करिटरा,35.क्षमा,36.दुधररा,37.दुरभगा,38.विशवा,39.विकटा,40.कला ,41.भूपा,42.नदी, 43.निर्मला,44.विशीर्णा,45.अबला,46.विभ्रमा,
47.सुरसुन्दरी,48.सुखदा,49.सिनगधा,50.सोदरा,51.अबला52.अमृत पलाविनी
53.कामधुक्54.करवारिणी 55.गहहरा56.कुनदिनी 57.रौद्रारा58.विषाखया59.विषनाशिनी 60.निर्मदा 61.शीतला 62.निम्ना
63.प्रीता 64.प्रियवधरनी 65.मानघना 66.दुभर्गा 67.चित्रा 68.चित्रिणी 69.चिरंजीवीनी 70.गदहरा71.नाला 72.नलिनी 73.सुधामृतांशुकलिका74.कुलषांकुरा 75.महामारी
सुधा
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